भारत के उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अपने कार्यकाल के मध्य में ही इस्तीफा दे दिया है, जिससे देश के संवैधानिक ढांचे में एक महत्वपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो गई है। उप राष्ट्रपति का पद देश में राष्ट्रपति के बाद दूसरा सर्वोच्च संवैधानिक पद होता है और धनखड़ का यह मध्यावधि इस्तीफा भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक दुर्लभ घटना है। उन्होंने अपने पत्र में स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया है और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को औपचारिक रूप से इस्तीफा सौंपा है। इस घटनाक्रम के बाद सबसे अहम सवाल यह है कि उप राष्ट्रपति के पद के खाली होने की स्थिति में अगली प्रक्रिया क्या होती है और नया चुनाव कैसे आयोजित किया जाता है।
भारतीय संविधान उप राष्ट्रपति के इस्तीफे की स्थिति में चुनाव संबंधी प्रक्रिया को “जितनी जल्दी संभव हो” उतने समय में कराने की बात करता है, लेकिन इसमें कोई सटीक समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है, जैसा कि राष्ट्रपति के मामले में होती है। अब चुनाव आयोग आगामी चुनाव के कार्यक्रम की घोषणा करेगा और संसद सचिवालय से नियुक्त रिटर्निंग ऑफिसर के अधीन यह प्रक्रिया संचालित की जाएगी। यह ध्यान देने योग्य है कि नए उप राष्ट्रपति का कार्यकाल धनखड़ की शेष अवधि तक नहीं, बल्कि पूरे पांच वर्षों का होगा। जब तक नया उप राष्ट्रपति चुना नहीं जाता, तब तक राज्यसभा की अध्यक्षता उप सभापति यानी हरिवंश नारायण सिंह द्वारा की जाएगी।
इस घटना के बाद यह भी चर्चा का विषय बन गया है कि कौन नए उप राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार होगा। उप राष्ट्रपति का चुनाव लोकसभा और राज्यसभा के निर्वाचित सदस्य करते हैं, जबकि राज्य विधानसभाओं के सदस्य इस प्रक्रिया में शामिल नहीं होते। उम्मीदवार को भारत का नागरिक होना चाहिए, न्यूनतम 35 वर्ष की आयु पूरी होनी चाहिए और उसे राज्यसभा का सदस्य बनने की पात्रता होनी चाहिए। इसके साथ ही उसके पास कोई लाभ का पद नहीं होना चाहिए।
यह इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब संसद का मानसून सत्र शुरू ही हुआ है और कई अहम विधेयक पारित होने हैं। ऐसे में जगदीप धनखड़ का इस्तीफा न केवल संवैधानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी चर्चाओं का केंद्र बन गया है। यह एक बार फिर साबित करता है कि भारत के लोकतंत्र में हर असामान्य स्थिति के लिए भी एक संरचित प्रक्रिया उपलब्ध है।

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