अमित शाह ने केरल में कहा था कि सुदर्शन रेड्डी ने साल्वा जुदुम (Salwa Judum) मामले में वह नक्सलवाद की सीमाओं का समर्थन करते रहे; उनके अनुसार, यदि यह फैसला नहीं दिया जाता, तो 2020 तक नक्सलवाद समाप्त हो सकता था । इस बयान की पुरजोर भर्त्सना करते हुए, पूर्व न्यायाधीशों ने कहा:
> “सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की जनहित में गलत व्याख्या दुर्भाग्यपूर्ण है। निर्णय किसी भी रूप में, चाहे स्पष्ट हो या अप्रत्यक्ष रूप से, नक्सलवाद या उसकी विचारधारा का समर्थन नहीं करता।”
उनका संदेश स्पष्ट था— high-level राजनीतिक हस्तियों द्वारा न्यायपालिका के निष्पक्ष निर्णयों का गलत तरीके से उपयोग किये जाने से “न्यायपालिका की स्वतंत्रता में सेंध” लग सकती है, और इससे “चिलिंग इफ़ेक्ट” उत्पन्न हो सकता है यानी न्यायाधीशों में निर्णय लेने की स्वतंत्रता पर असर हो सकता है ।
पूर्व न्यायाधीशों ने यह भी जोर दिया कि उपराष्ट्रपति चुनाव जैसे संवैधानिक और प्रतिष्ठित पदों के चुनाव में अभियान अभियान-जनित वैचारिक संघर्ष हो सकते हैं, लेकिन यह “सभ्यता और गरिमा के साथ” किए जाने चाहिए। “नाम-calling” इससे पद की गरिमा और लोकतांत्रिक संस्थानों को क्षति पहुंचाता है ।
न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) सुदर्शन रेड्डी ने इस टिप्पणी पर चुप्पी साधते हुए स्पष्ट किया कि वह निर्धारित न्यायमूर्ति नहीं हैं, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट का निर्णय था जिसमें दलीलें पूरी तरह समझकर अधिकारिक रूप से निर्णय दिया गया था। शाह शायद पूरे निर्णय को पढ़े बिना ही टिप्पणी कर गए ।
साल्वा जुदुम को लेकर यह सुप्रीम कोर्ट का 2011 का निर्णय था, जिसमें न्यायमूर्ति सुदर्शन रेड्डी और न्यायमूर्ति S. S. Nijjar की बेंच ने आदिवासी युवाओं को विशेष पुलिस अधिकारियों की भूमिका में तैनात करने को गैरकानूनी और असंवैधानिक माना था, और इस गुट को भंग करने का आदेश दिया था ।
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निष्कर्ष:
पूर्व न्यायाधीशों ने अमित शाह की टिप्पणी को न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत बताया, बल्कि इसे लोकतंत्र और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए प्रतिकूल भी बताया। उनका संदेश स्पष्ट है कि संवैधानिक चुनावों में गरिमा, तथ्यात्मकता और संस्थागत सम्मान बनाए रखना कितना आवश्यक है।
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